जहाँ प्रकृति बोलती नहीं, महसूस होती है

प्रकृति को समझने के लिए शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। उसका अस्तित्व स्वयं में पूर्ण होता है।

जब शोर कम होता है, तब ही असली अनुभव सामने आता है। पेड़ों की छाया, हवा की हल्की सरसराहट और आकाश की गहराई बहुत कुछ कह जाती है।

आधुनिक जीवन की जटिलताओं में हम अक्सर भूल जाते हैं कि शांति बाहर नहीं, भीतर से आती है।

“प्रकृति से जुड़ना, खुद से जुड़ने का सबसे सरल तरीका है।”